Bandishe!

 

ख्वाइशे तो हजारो है इस दिल मे पर बंदिशे कर देती हर मजबूर ,
रस्ते मे ही भटक रह हू और मंजिल है अभी बहुत दूर ,

जाने क्यो मेरी हर सोच के दो पहलु बन जाते है ,
चाह कर भी कुछ काम नही हो पाते है और न चाहते हुए भी कुछ अपने आप हो जाते है ,
जब यह दो दो आखें ,दो कान एक तरह से देखते और सुनते है ,
तो यह एक बिचारे दिल महाशय क्यो हजार रास्ते दिखलाते है ,
इन्ही रास्तों के बीच अटक जाता हू इसमे क्या है मेरा कुसूर ?

दुनिया है मेरी एक जिसको जी रहा हू खुल के ,
फिर भी क्यो एक कसक रह जाती है ,
जब अपने अंदर झाकता हो , तो असली दुनिया नज़र आती है ,
गम ,खुसी ,पागलपन और न जाने क्या क्या ,
अंदर इस सैलाब मी बहुत चीज़ समायी है ,

खुद को जाने और खुद से बातें करके मैंने बहुत shanti पायी है ,
इस दूसरी दुनिया का है कुछ अलग ही सुरूर ,
ख्वाइशे तो हजारो है इस दिल मे , पर बंदिशे कर देती हर मजबूर ,
रस्ते मे ही भटक रह हू और मंजिल है अभी बहुत दूर ।

अपनी ज़िंदगी मे बहुत कुछ चाहता हू ,
कभी कभी अपने आप को समझ नही पाता हू ,
जिसको जानता नही हू ठीक से उसको मुस्कराहट दे जाता हू ,
और जो मेरे बहुत करीब है उसको सलाम करने मे घंटो लगता हू ,
यह मेरा बचपना ही है , नही है मेरा ghuroor ,
ख्वाइशे तो हजारो है इस दिल मे , पर बंदिशे कर देती हर मजबूर ,
रस्ते मे ही भटक रह हू और मंजिल है अभी बहुत दूर ।

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