Hindi Poems

Kadam ruk gaye !

वक़्त कुछ थम सा गया है ,
पर चाह है आगे बढने की ,
कोई डोर खीच रही है पीछे ,
जाने क्यों कदम रुक गए है यही ,

आज भी कोशिश जारी है ,
इस जाल से निकलने की ,
अपने पंखो को खोल कर ,
वैसे ही आसमा में उड़ने की ,

अंजानी सी कशमकश है ,
एक बैचैनी से है हों रही ,
क्या कुछ छूट रहा है पीछे ,
या है बस मेरी गलतफैमी ?

ढूंढ रही हूँ अपने अस्तित्व को ,
जो कही खो सा गया है ,
तन्हैयाँ भाने लगी मुझे ,
अकेलापन अपना सा हों गया है ,

रास्ते दिखाई दे रहें है ,
पर आगे बढने की हिम्मत नहीं ,
कोई डोर खीच रही है पीछे ,
जाने क्यों कदम रुक गए है यही !!

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